देहरादून लगातार बढ़ते दबाव वाला शहर है—12 लाख से अधिक पंजीकृत वाहन, संकरी सड़कें, अनियोजित पार्किंग, और फोर्स की भारी कमी। ऐसे समय में अपर पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि शहर की धड़कनों को परखने वाली गंभीर कवायद थी। इस बैठक ने साफ कर दिया कि देहरादून का ट्रैफिक किसी एक विभाग की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की सामूहिक चुनौती है।

फोर्स कम, दबाव ज्यादा—यातायात पुलिस की हकीकत
बैठक में सामने आए आंकड़ों ने एक सच्चाई उजागर की—शहर की रफ्तार रोकने वाला सबसे बड़ा कारण पुलिस फोर्स की भारी कमी है।
2017 में 411 यातायात पुलिसकर्मी थे। आज केवल 269।
विकासनगर, मसूरी और ऋषिकेश जैसे भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में जहां विशेष ट्रैफिक प्रबंधन की जरूरत है, वहां तैनाती नाममात्र की है। यह स्थिति बताती है कि बढ़ते शहर के साथ पुलिस व्यवस्था नहीं बढ़ी।
शहर की सड़कें—वाहनों का बोझ और विभागीय उदासीनता
देहरादून में सड़कें केवल वाहन ही नहीं बल्कि कई विभागों की उदासीनता का भार भी झेल रही हैं।
PWD, UPCL, जल संस्थान और GAIL—हर विभाग अपनी सुविधा से सड़कों को खोदता है, मरम्मत करता है, और फिर महीनों खुला छोड़ देता है।
परिणाम—जाम, दुर्घटनाएं, और जनता का समय बर्बाद।
इस समस्या के समाधान के लिए एडीजी ने रात में ही निर्माण कार्य की अनुमति देने और विभागीय समन्वय की अनिवार्यता पर जोर दिया। यह निर्णय न केवल व्यावहारिक है बल्कि शहर को राहत देने वाला भी।
कड़े चालान—दुर्घटनाओं में 18% की कमी, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?
ड्रंक एंड ड्राइव में 274%
ओवर स्पीडिंग में 177%
रेड लाइट जंपिंग में 98%
ये आंकड़े डराते हैं और चेतावनी देते हैं कि सड़कें केवल वाहन ज्यादा होने से खतरनाक नहीं हैं, चालक भी उतने ही जिम्मेदार हैं।
फिर भी, पुलिस की कड़ी कार्रवाई के परिणामस्वरूप दुर्घटनाओं में 18% की कमी आई है—यह बताता है कि सख्ती का सीधा प्रभाव पड़ता है।
लेकिन सवाल है—क्या सिर्फ चालानों से शहर सुधर जाएगा?
जवाब है—नहीं।
वेंडिंग, पार्किंग और बॉटलनेक्स—शहर की गति के तीन सबसे बड़े दुश्मन
12 मुख्य मार्गों को नो-वेंडिंग जोन घोषित करना स्वागतयोग्य कदम है।
241 पार्किंग स्थल चिन्हित करना भी सकारात्मक संकेत है।
52 ब्लैक स्पॉट घटाकर 20 तक लाना पुलिस की गंभीरता दर्शाता है।
लेकिन इन कदमों को जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू करना ही असली चुनौती है। जब तक फुटपाथ कब्जों से नहीं बचेंगे, बेसमेंट पार्किंग गोदाम नहीं बनेंगी और नो-पार्किंग में खड़ी गाड़ियां चालकों की आदत नहीं बदलेंगी—तब तक शहर की रफ्तार अटकती ही रहेगी।
जन-जागरूकता ही असली इलाज
एडीजी का “जन संवाद” और “रियल टाइम अपडेट” का प्रस्ताव अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यातायात सिर्फ पुलिस का काम नहीं—जनता की जिम्मेदारी भी उतनी ही है।
जब नागरिक नियमों का पालन करेंगे, तकनीक का उपयोग बढ़ेगा, और ट्रैफिक को शहर की साझा समस्या माना जाएगा, तभी सुधार स्थायी होगा।

देहरादून बदलाव की दहलीज पर है
देहरादून की ट्रैफिक समस्या आज एक क्राइसिस बन चुकी है, लेकिन इस बैठक से यह उम्मीद जरूर जगी है कि पुलिस, प्रशासन और जनता मिलकर शहर को राहत दे सकते हैं।
यह सिर्फ निर्देशों की सूची नहीं, बल्कि देहरादून को जाम से मुक्त करने का रोडमैप है—सख्त कार्रवाई, बेहतर प्रबंधन और साझी जिम्मेदारी के साथ।
यदि इन निर्देशों को जमीन पर वह ताकत मिल जाए जिसकी जरूरत है, तो देहरादून एक बार फिर अपनी रफ्तार पा सकता है।