देहरादून, 31 अगस्त 2025। उत्तराखंड की लोकभाषाओं गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) के माध्यम से संरक्षित और बढ़ावा देने की दिशा में आज देहरादून में एक अहम प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित की गई। इस पहल को उत्तराखंड की भाषा और संस्कृति को डिजिटल युग से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

इस अवसर पर एआई आर्किटेक्ट सचिदानंद सेमवाल ने कहा –
“यह कार्य हमारी बोली-भाषाओं के लिए मील का पत्थर साबित होगा। आने वाली पीढ़ियाँ अब Garhwali, Kumauni और Jaunsari में ChatGPT, Grok और Gemini जैसे AI टूल्स पर बोलने, लिखने और सीखने में सक्षम होंगी।”
उन्होंने बताया कि इस परियोजना के लिए भाषाविदों और संस्कृति विशेषज्ञों की मदद से एक प्रमाणिक डेटा सेट तैयार किया जाएगा, जिससे AI मॉडल्स को प्रशिक्षित किया जाएगा।
पद्मश्री प्रीतम भारतवाण, अपनी जागर एवं ढोल सागर अकादमी के माध्यम से भाषाई प्रमाणिकता और लोकसंस्कृति का योगदान देंगे। वहीं, सचिदानंद सेमवाल अपने 23 वर्षों के सॉफ्टवेयर, क्लाउड और AI अनुभव तथा विशेषकर अमेरिका में 4 वर्षों के जनरेटिव AI कार्यानुभव के आधार पर तकनीकी नेतृत्व करेंगे।
परियोजना के प्रशासनिक समन्वय और मार्गदर्शन में श्री मस्तु दास, श्री शक्ति प्रसाद भट्ट और श्री के. एस. चौहान सक्रिय भूमिका निभाएँगे।
सरकार से भी इस पहल को सकारात्मक समर्थन मिला है। मुख्यमंत्री, भाषा मंत्री श्री सुबोध उनियाल और भाषा सचिव ने परियोजना के लिए सहमति एवं सहयोग का आश्वासन दिया है। जल्द ही उत्तराखंड की मातृभाषाएँ AI आधारित चैट मॉडल्स पर उपलब्ध होंगी।